परमाणु “सेनापति” की छत्रछाया में

परमाणु “सेनापति” की छत्रछाया में

परमाणु “सेनापति” की छत्रछाया में

परमाणु "सेनापति" की छत्रछाया में

 
© फोटो: ru.wikipedia.org/Zmey Kaa Kobra/cc-by-sa 3.0

आज से पच्चीस साल पहले सोवियत अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल “आर-36एम2”, जिसे “वॉएवोदा” यानी “सेनापति” भी कहा जाता है, को तैनात किया गया था।

इस वर्ग की मिसाइलें तब सबसे विनाशकारी थीं और ये मिसाइलें किसी भी मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली को नश्ट कर सकती थीं। “शीतयुद्ध” के दौरान “वॉएवोदा” मिसाइलें बहुत मशहूर हुईं। परमाणु प्रतिरोध की नीति के क्षेत्र में इस मिसाइल प्रणाली की भूमिका कैसी थी और ऐसी मिसाइलों के स्थान पर अब किस प्रकार की मिसाइलें तैनात की जाएँगी? “रेडियो रूस” के इस सवाल का जवाब कुछ विशेषज्ञों द्वारा दिया गया है।

नाटो गठबंधन के देशों में “आर-36एम2” वर्ग की इस रूसी मिसाइल को एक बड़ा ही डरावना नाम, “शैतान” दिया गया था। सोवियत संघ और अमरीका के बीच राजनीतिक टकराव और हथियारों की दौड़ के दौरान ऐसे कई “शैतानों” और “राक्षसों” ने जन्म लिया था। महासागरों की गहराइयों में परमाणु मिसाइलों से लैस परमाणु पनडुब्बियों की भीड़ लगी हुई थी। अटलांटिक महासागर के दोनों किनारों पर सचमुच में मिसाइलों की बाड़ें लग गई थीं। हथियारों की यह होड़ धीरे-धीरे अंतरिक्ष तक भी पहुँच गई थी।

इस प्रसंग में रूस के सामरिक मिसाइल बलों के पूर्व कार्यालय-प्रमुख विक्टर एसिन ने “रेडियो रूस” को बताया है कि “स्टार वार्स” यानी “तारा युद्ध” की यह अमरीकी अवधारणा दूसरों की आँखों में धूल झोंकने की एक कोशिश मात्र थी, लेकिन इस कोशिश का सोवियत संघ द्वारा एक बड़ा ही ठोस जवाब दिया गया था। इस सिलसिले में विक्टर एसिन ने कहा-

सोवियत संघ ने अपनी मिसाइल प्रणाली “वॉएवोदा” स्थापित करने का निर्णय अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन द्वारा “रणनीतिक सुरक्षा पहल” यानी तथाकथित “तारा युद्ध” की तैयारी करने की घोषणा के बाद ही लिया गया था। इस अमरीकी पहल के अंतर्गत एक मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली की विशाल पैमाने पर तैनाती की जानी थी। अमरीका की इसी मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली को तोड़ने के लिए सोवियत संघ को अपनी मिसाइल-तोड़क प्रणाली का निर्माण करने की आवश्यकता थी। तब ही “वॉएवोदा” मिसाइल प्रणाली का निर्माण किया गया था।

“वॉएवोदा” मिसाइल प्रणाली का मुख्य लाभ यह है कि इस वर्ग की मिसाइलें अपने साथ बड़ी संख्या में परमाणु बम लेकर उड़ सकती हैं और दुश्मन के इलाके पर मार कर सकती हैं। वे किसी भी प्रकार की मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली को नष्ट कर सकती हैं। इस संबंध में विक्टर एसिन ने कहा-

इस मिसाइल का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह लगभग नौ टन वज़न के परमाणु बम अपने साथ लेकर उड़ सकती है। यह वज़न उस वज़न से दोगुना है जिसे अमरीका की सबसे शक्तिशाली मिसाइल एम.एक्स. लेकर उड़ सकती है। इसकी बदौलत इस रूसी मिसाइल को कई प्रमाणु बमों और मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली को नष्ट करनेवाले उपकरणों से लैस किया जा सकता है। इसके अलावा, यह मिसाइल इतनी मज़बूत है कि शत्रु की मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली इसे कोई अधिक क्षति नहीं पहुँचा सकती है।

“वॉएवोदा” मिसाइल प्रणाली के इन लाभों के साथ-साथ इसमें कुछ त्रुटियां भी पाई जाती हैं। इसकी सबसे बड़ी त्रुटि यह है कि यह मिसाइल प्रणाली मोबाइल नहीं है। इसे किसी एक निश्चित स्थान पर ही तैनात किया जा सकता है। वैसे भी आजकल इतने विनाशकारी हथियारों की ज़रूरत नहीं रही है। इस संबंध में रूस के सामाजिक-राजनीतिक अध्ययन केंद्र के निदेशक व्लादिमीर येवसियेव ने कहा-

 अब ऐसी भारी मिसाइलों की ज़रूरत नहीं रही है। आजकल हलकी मिसाइलें बनाई जा रही हैं जोकि परमाणु हथियारों में कटौती की नीति से मेल खाती हैं। बेशक, इन मिसाइलों पर बड़ी संख्या में परमाणु बम फिट नहीं किए जाएंगे।

अब “वॉएवोदा” मिसाइल प्रणाली को धीरे-धीरे उसकी ड्यूटी से हटाया जा रहा है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि रूस के पास भारी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें नहीं होंगी। जैसा कि व्लादिमीर येवसियेव ने बताया है, भविष्य में “वॉएवोदा” के स्थान पर नई मिसाइल प्रणाली “सर्मात” को तौनात किया जाएगा।
और पढ़ें: http://hindi.ruvr.ru/2013_07_30/parmanu-senapati-chatrachaya/

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